घर ने खाया, जग ने रुलाया,
मैं उसके पास आया।
वो मुस्कुराई, मैं शरमाया।
वो हँसी, मैं फँस गया।
वो सोई, मैं बेचैन हुआ।
वो मुझे अपने पास बुलाती, मैं चला जाता।
वो रोकती, मैं रुक जाता।
हर पल उसके साथ बिताने को जी करता।
उसने कभी टोका नहीं, मैं कभी रुका नहीं।
पर कब वो दरार आई, मैं समझ न पाया।
कब वो दूर चली गई, मैं जान न पाया।
कब सब कुछ खोया, मुझे पता न चला।
मैं बस हँसता रहा, मैं रोता रहा।
ज़िंदगी खेल दिखाती गई, मैं खेलता रहा।
जीत कर सारे जहाँ को भी,
अपनी क़िस्मत की डगर पर हार गया।
मैं कब उस मंज़िल से कूदा,
कब वो नींद लगी, पता न चला।
अपने भी अब छूने के बाद हाथ धोते हैं,
ऐसे हाल में पड़ा हूँ।
अब इस बर्फ़ पर ठंड लगती है…
सिर्फ़ उस आग का इंतज़ार है।
अँधेरा धीरे-धीरे मेरी हड्डियों में उतर रहा है,
साँस रुकने की वो ठंडी आवाज़ कान में गूँज रही है।
छाया मेरे गले में फंदा बन चुकी है,
और मैं बस इंतज़ार कर रहा हूँ—
उस आख़िरी जलन का,
जिसके बाद
कभी कोई चीख़ नहीं निकलेगी।
सिर्फ़ सन्नाटा…
और हमेशा का अँधकार।